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खाली होकर भर जाना

हम सभी भराव चाहते हैं — जीवन में, मन में, रिश्तों में। हम सोचते हैं कि जितना ज़्यादा हमारे पास होगा, उतना ही बेहतर हमारा जीवन होगा। लेकिन क्या आपने कभी खालीपन को समझने की कोशिश की है?

जो चीज़ें हमें सबसे ज़्यादा शांति देती हैं, वो अक्सर "खाली" होती हैं। आकाश में कोई दीवार नहीं होती, फिर भी वही सबसे ज़्यादा फैलाव देता है। समुद्र की गहराई उसके खालीपन से आती है, न कि सिर्फ पानी से। एक बर्तन तब तक उपयोगी नहीं होता जब तक उसमें खाली जगह न हो।

इंसान भी ऐसा ही है। जब मन खाली होता है — विचारों के शोर से, अपेक्षाओं के बोझ से, डर और गुस्से से — तभी उसमें कुछ नया उतर सकता है। जैसे बारिश की बूंद तभी ज़मीन पर असर करती है जब ज़मीन ने पुरानी नमी छोड़ दी हो।

खाली होना कमजोरी नहीं है। ये उस स्थिति का नाम है जहाँ हम अपने भीतर की आवाज़ को सुन पाते हैं। जब मन शांत होता है, तभी सच्चा बोध आता है। तभी हम दूसरों की बात को गहराई से सुन पाते हैं, और खुद को बेहतर समझ पाते हैं।

खालीपन एक आमंत्रण है — खुद से जुड़ने का, और जीवन को वैसे देखने का जैसा वह वास्तव में है। जब हम हर पल को भरने की ज़रूरत छोड़ देते हैं, तब हम उस पल को महसूस कर पाते हैं।

हमारी संस्कृति में ध्यान का मूल उद्देश्य ही यही है — मन को खाली करना। जब आप बैठते हैं और सिर्फ सांसों को महसूस करते हैं, तो धीरे-धीरे विचारों का कोलाहल शांत होता है। और तभी आप जीवन की सूक्ष्म ध्वनि सुन पाते हैं।

तो अगली बार जब आपको कुछ खोने का डर लगे, या आपको लगे कि आपके पास कुछ नहीं है — उस खालीपन से डरिए मत। उसमें छुपा है सृजन। उसी से निकलता है परिवर्तन। वही खाली जगह आपको खुद से मिलवाती है।

जीवन भराव से नहीं, समझ से सुंदर बनता है। और समझ तब आती है जब हम भीतर से खाली होते हैं।


Written by Team Inspire

Published by Novel Mint Publishing



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A post card to summer - Letter to the season of Sunshine and Oceans.